MP: भाजपा की राष्ट्रीय टीम में ग्वालियर-चंबल को अहम जगह, सात नेताओं को मिली जिम्मेदारी

नितिन नवीन की राष्ट्रीय टीम में अंचल के तीन नेताओं को स्थान; बढ़े राजनीतिक कद के साथ अपने गढ़ में संगठन मजबूत करने की चुनौती

MP। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने श्रावण मास के तीसरे सोमवार को अपनी राष्ट्रीय टीम की घोषणा की। इसमें मध्य प्रदेश के सात नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। खास बात यह है कि इनमें तीन नेता ग्वालियर-चंबल अंचल से हैं। राष्ट्रीय संगठन में बढ़ी भागीदारी से दिल्ली और भोपाल की राजनीति में इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ा है। हालांकि, इसके साथ ही इन नेताओं के सामने अपने राजनीतिक क्षेत्र में पार्टी के संगठन और जनाधार को और मजबूत करने की चुनौती भी रहेगी।

ग्वालियर-चंबल में भाजपा के पास पहले से ही मजबूत संगठनात्मक ढांचा और प्रभावशाली नेतृत्व मौजूद है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया क्षेत्र के प्रमुख जननेताओं में शामिल हैं, जबकि विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को लंबे समय से संगठन को मजबूत तरीके से संभालने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद पिछले कुछ चुनावों में सामने आए राजनीतिक बदलावों ने यह स्पष्ट किया है कि केवल बड़े नेताओं और मजबूत संगठन के दम पर इस क्षेत्र में लगातार राजनीतिक बढ़त बनाए रखना आसान नहीं है।

अंचल की राजनीति में उभरता युवा चेहरा

भाजपा ने प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे आशीष अग्रवाल को राष्ट्रीय मीडिया टीम में सह-संयोजक की जिम्मेदारी दी है। राष्ट्रीय संगठन में मिली यह भूमिका उन्हें प्रदेश और खासतौर पर अंचल की राजनीति में एक उभरते हुए युवा चेहरे के तौर पर स्थापित करती है। आशीष अग्रवाल वैश्य समाज से आते हैं।

राष्ट्रीय जिम्मेदारियों से बढ़ा राजनीतिक प्रभाव

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके वीडी शर्मा को प्रकोष्ठ संकुल का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। संगठन के लिहाज से इसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माना जा रहा है। वहीं लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। आर्य अनुसूचित वर्ग के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं और ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में अनुसूचित वर्ग का महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव है।

ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में उनकी भूमिका भाजपा के सामाजिक आधार को विस्तार देने में उपयोगी हो सकती है। वहीं अंचल के कई नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी मिलने से भाजपा की आंतरिक राजनीति में भी इसका असर देखने को मिल सकता है। सिंधिया और तोमर जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच संगठन के दूसरे नेताओं की भूमिका और प्रभाव का संतुलन भी महत्वपूर्ण रहेगा।

राष्ट्रीय संगठन में नई जिम्मेदारियां मिलने से ग्वालियर-चंबल के नेताओं का राजनीतिक कद जरूर बढ़ा है, लेकिन इसके साथ अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। अब चुनौती यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर मिली इन जिम्मेदारियों और प्रभाव को क्षेत्र में पार्टी के संगठनात्मक विस्तार और मजबूती में किस तरह बदला जाता है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने क्षेत्र की सभी सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन विधानसभा स्तर पर कांग्रेस अभी भी चुनौती बनी हुई है।

2018 में कांग्रेस की बड़ी बढ़त, 2020 में बदला पूरा समीकरण

ग्वालियर-चंबल अंचल में चार लोकसभा और 34 विधानसभा सीटें हैं। वर्तमान में चारों लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं। हालांकि विधानसभा चुनावों में पिछले आठ वर्षों के दौरान क्षेत्र की राजनीति में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं।

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को बड़ा झटका देते हुए 34 में से 26 सीटों पर जीत हासिल की थी। उस चुनाव में भाजपा केवल छह सीटों पर सिमट गई थी। चुनाव के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के प्रमुख प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे और क्षेत्र के चुनाव परिणामों में उनका प्रभाव भी दिखाई दिया था।

इसके बाद वर्ष 2020 में सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने से ग्वालियर-चंबल की राजनीति का समीकरण बदल गया। उनके साथ बड़ी संख्या में समर्थक नेता और विधायक भी भाजपा के साथ आ गए। इससे विधानसभा में भाजपा की स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत हुई।

बाद के चुनावों में भाजपा ने क्षेत्र में अपनी स्थिति लगातार सुधारी। पार्टी ने अंचल की 16 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए 18 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 16 सीटें आईं। इस तरह भाजपा ने 2018 के मुकाबले क्षेत्र में उल्लेखनीय वापसी की, लेकिन ग्वालियर-चंबल को पूरी तरह कांग्रेस मुक्त करने का लक्ष्य अभी भी पूरा नहीं हुआ है।

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